लापरवाही हमारे डीएनए में है; आजाद भारत में प्रशासन का सबसे बड़ा फेलियर है 'Corona Second Wave'!

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लापरवाही हमारे डीएनए में है; आजाद भारत में प्रशासन का सबसे बड़ा फेलियर है 'Corona Second Wave'!

  • आंकलन करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि अभी कोरोना महामारी समाप्त नहीं हुई है, और यह सालों तक जारी रह सकती है
  • भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर चीज को आगे बढ़कर नेतृत्व देते रहे हैं, इस मामले में वह पूरी तरह से फेल नजर आए
  • इन तमाम मामलों को खासकर राजनीतिक रूप से इस संकट पर वाइट पेपर जारी होना चाहिए, जवाबदेही तय होनी चाहिए कि कहां गलतियां हुईं, क्या समस्याएं आईं

Corona Second Wave! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Hindi Content

लेखकमिथिलेश कुमार सिंहनई दिल्ली 
Published on 2 May 2021 (Last Update: 3 May 2021, 6:12 AM IST)

कोरोना की दूसरी लहर के साथ-साथ 'ब्लेम गेम' चालू है!

नौकरशाही, राजनीति को इसके लिए जिम्मेदार मान रही है, तो राजनीतिक लोग इसके लिए आम आदमी को जिम्मेदार मान रहे हैं. वहीं पब्लिक इसके लिए कोर्ट जा रही है, तो कोर्ट इसके लिए चुनाव आयोग को हत्यारा तक बता रहा है... और इस तरह से ब्लेम गेम चालू है!

परंतु अगर आप ईमानदारी से आंकलन करें, तो आप इस नतीजे पर पहुंच ही जाएंगे कि लापरवाही हमारे खून में है. यह लापरवाही भी क्रमवार है, मतलब जितना बड़ा पद, उतनी ही बड़ी लापरवाही!
संभवतः हम इस बात के लिए अभ्यस्त हो चले हैं कि किसी भी कार्य में हमारी जिम्मेवारी है ही नहीं! एकाउंटेबिलिटी की बात भी छोड़ दीजिए, हम यहाँ तक लापरवाह हैं कि कोई संकट अगर हमारे सर पर खड़ा है, तो वह संकट हमें संकट नहीं लगता है, हम उसका इलाज नहीं ढूंढते हैं, बल्कि दैव योग से उस संकट के गुजर जाने की प्रतीक्षा ही हमारी नियति हो चुकी है.

दुर्भाग्य को देखते-समझते हुए भी हम आंख बंद कर लेते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे बिल्ली को देखकर कबूतर अपनी आंखें बंद कर लेता है.
किंतु जिस प्रकार से कबूतर के आंख बंद करने के बावजूद भी बिल्ली उस पर झपट्टा मारती ही है, ठीक उसी प्रकार हम भी मुसीबत में फंसते ही रहते हैं. कभी वह मुसीबत छोटी होती है तो कभी कोरोना जैसी महामारी, जिसने भारत में लाशों का अम्बार लगाना शुरू कर दिया है.

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वस्तुतः गड़बड़ियां कई स्तर पर हुई हैं और उसके आंकलन का यह मतलब कतई नहीं है कि कोई डर को बढ़ा रहा हैं, या फिर नकारात्मकता फैला रहा है, बल्कि समस्या के प्रत्येक पक्ष को समझने से. आने वाले भविष्य में वह समस्या बेहतर ढंग से हैंडल की जा सकती है. हालाँकि, अतिवादी लोग इसे लेकर बेहद संकुचित नजरिया अपनाते हैं, जो अपने आप में सबसे बड़ा दुर्भाग्य है!

Corona Second Wave'! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Media Roles

सफ़र के दौरान, सड़कों पर आपको अक्सर लिखा मिल जाएगा कि "सावधानी हटी, दुर्घटना घटी"!
वस्तुतः जीवन के हर क्षेत्र में, हर वक्त का सत्य यही है. आप जरा सी लापरवाही कीजिए, और नुकसान आपके सामने होगा.
  • घर में बच्चों पर ध्यान ना दीजिए, और खेल - खेल में उनको कब चोट लग जाएगी, इसका अनुभव हम सभी को होगा ही!
  • अपने घर में जरा सी लापरवाही कीजि,ए ठीक ढंग से सुरक्षा उपायों को ना कीजिए, कब चोरी हो जाएगी, अपने आस पास में इसका अनुभव भी हम सब को अवश्य ही हुआ होगा!
  • हेल्थ से रिलेटेड जरा सी लापरवाही कीजिए, चाहे खानपान से संबंधित लापरवाही हो या फिर किसी बीमारी के सामान्य लक्षणों के इलाज से संबंधित लापरवाही हो, आप कब गंभीर रूप से बीमार पड़ जाएंगे, इसका अंदाजा आपको नहीं लगेगा!
  • ऐसे ही अगर आप किसी आर्थिक मुसीबत में हैं और लापरवाही को नियमित रूप से जारी रखे हुए हैं, तो आप कभी उस मुसीबत से शायद बाहर निकल ही नहीं पाएंगे.
ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं!

 किसी ज्ञानी पुरुष ने ठीक ही कहा है कि मुसीबत तब तक आप से दूर रहती है, जब तक आप उसे याद रखते हैं, और उसके प्रति सावधान रहते हैं. ज्योंही आप असावधान होते हैं, मुसीबत आपको घेर लेती है.

ऐसे तमाम उदाहरण हैं, किंतु कोरोना को लेकर एक बार हमें आंकलन अवश्य ही करना चाहिए कि हमारी लापरवाही वास्तव में क्या रही है?

यह जानने का प्रयत्न करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि अभी यह महामारी समाप्त नहीं हुई है, और यह मुसीबत कब तक चलेगी, इसका आंकलन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है. परंतु अगर खूब सकारात्मक ढंग से ही सोचा जाए, तो भी आने वाले साल 2 साल हमारे लिए कोरोना वायरस से प्रभावित साल ही रहने वाले हैं, इस बात में शायद ही किसी को संदेह हो!

इसीलिए वर्तमान समय में की गई लापरवाहियों को समझना और उस अनुरूप सुधार करना हमारे लिए सामयिक है....

खतरे का आंकलन बेहद निराशाजनक रहा! (Corona Risk Analysis was poor) 

जी हां! किसी भी खतरे का सटीक आंकलन करना, उसका ठीक तरीके से डायग्नोस करना बेहद जरूरी है. कोरोना वायरस की स्पेसिफिक बात करें तो राजनीति, प्रशासन से लेकर तमाम बिजनेस हाउस, और नौकरशाही से लेकर आम पब्लिक इस खुशफहमी में आ गई कि कोरोना वायरस है ही नहीं!

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हालांकि किसी भी साइंटिफिक एक्सपर्ट ने ऐसा दावा नहीं किया, बल्कि वह लगातार चेतावनी दे रहे थे कि कोरोना की दूसरी वेव आने वाली है, किंतु किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. खासकर केंद्र सरकार ने इस मामले में भयंकर चूक करी.

इससे पहले तक, जिस प्रकार से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर चीज को आगे बढ़कर नेतृत्व देते रहे हैं, इस मामले में वह पूरी तरह से फेल नजर आए. पिछले 6 सालों से अधिक समय से, जब से वह पीएम बने हैं, चीजों को सेंट्रलाइज करने में वह यकीन रखते रहे हैं. हर बार वह सामने आते हैं और चीजों की घोषणा करते हैं, किंतु कोरोना के सेकंड वेव में उन्होंने देश को एक तरह से असहाय छोड़ दिया, और खुद चुनावी अभियान में व्यस्त रहे.

Corona Second Wave! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Political Rally

कहने को चुनावी रैलियों के दुष्प्रभाव का डायरेक्ट आंकलन नहीं किया जा सकता, कोई किंतु देश भर में मैसेज यही गया कि सब कुछ नॉर्मल है, सब चंगा सी!
कोई कोरोना महामारी नहीं है! आखिर, जब प्रधानमंत्री बड़ी बड़ी रैलियां कर रहे हैं, तो सबको निश्चिंत हो जाना चाहिए.
निसंदेह रूप से इस मैसेजिंग ने भारत को खतरनाक कोरोना लहर की ओर धकेला है, इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सकेगा. 

हालांकि इस साल के फरवरी और मार्च की शुरुआत में ही महाराष्ट्र में कोरोना वायरस विकराल रूप ले चुका था. उसके बावजूद भी सेंट्रल गवर्नमेंट और दूसरी राज्य सरकारें इस के आंकलन में गंभीर रूप से चूक गईं. लोगों ने भी इसको सीरियसली नहीं लिया, और सोचा कि सिर्फ महाराष्ट्र में ही तो यह फैला है, और बाकी देश इससे मुक्त है. यह बेहद गंभीर चूक थी!

केंद्र सरकार के बाद राज्य स्तर पर भी यह चूक जारी रही. यहां तक कि कोर्ट से लेकर नौकरशाही तक, मीडिया से लेकर पब्लिक और तमाम स्वास्थ्य व सामाजिक संगठन सभी इस में फेल हुए, और अंततः भारत आजादी के बाद अब तक के संभवतः सबसे खतरनाक संकट में फंस गया, और शायद सबसे शर्मनाक खतरे में भी, जिसके सटीक आंकलन से संभवतः हम बच सकते थे.

कहना सामयिक होगा कि हमारा मेडिकल सिस्टम भी इसमें फेल ही हुआ. कहने को तो नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल यानी एनसीडीसी इस तरह की चीजों पर नजर रखता है, तो आईसीएमआर और दूसरे साइंटिफिक इंस्टिट्यूट इसकी हेल्प करते हैं, किंतु इस मामले में मेडिकल सिस्टम भी एक तरह से फेल ही रहा. हमारे देश में हेल्थ सिस्टम कमजोर है, इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा, किंतु इस तरह की लापरवाही और खतरे के आंकलन में चूक हमारे लिए कितनी भारी पड़ी, यह आज हम देख रहे हैं!

किसी भी स्तर पर, वह चाहे ट्रांसपोर्ट सिस्टम का ही कोई भाग क्यों न हो, कोई एयरपोर्ट हो, रेलवे हो, किसी भी स्तर पर निगरानी नहीं किए जाने से यह समस्या अति खतरनाक बन गई और लाशों के ढेर लगाती गयी... जो अभी जारी है... और पता नहीं कब तक जारी रहने वाला है!

श्मशान वैराग्य से मुक्ति (Shamsan Vairagya se Mukti)

कहा जाता है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो लोग उसकी अंतिम यात्रा पर श्मशान घाट में जाते हैं, और तब उन्हें जीवन का सार पता चलता है कि यह संसार आखिर नश्वर है. ऐसे में किसके लिए मनुष्य पाप कर्म कर रहा है. अंततः सब कुछ यहीं तो रह जाना है, किंतु कितने आश्चर्य की बात है कि ज्योंही वह व्यक्ति श्मशान घाट से बाहर आता है, तत्काल ही वह सब कुछ भूल जाता है, और फिर उसी अधर्म में लग जाता है, जिससे श्मशान में, क्षण भर के लिए ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है!

Corona Second Wave! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Funeral Scenes

विश्व भर में कोरोना जिस तरह से हाहाकार मचा चुका था, और भारत भी इसकी पहली लहर में इकोनॉमी से लेकर हेल्थसिस्टम और ट्रांसपोर्ट इत्यादि सभी का पहिया रुकना देख चुका था, उस एक साल के श्मशान वैराग्य को हम यूं भूल गए, जैसे कोई व्यक्ति किसी मृतक की अंतिम यात्रा से बाहर आने के तत्काल बाद सब कुछ भूल जाता है. 


हम झटके से श्मशान वैराग्य से मुक्ति पा गए और अपने आप को अमर समझ बैठे!
बिंदास, शादियों से लेकर कुम्भ और चुनावी रैलियों की तो खैर बात ही न पूछिए... सब करने लगे... बिंदास... खुलकर!

कोई तैयारी नहीं, कोई प्लानिंग नहीं... मानो हमें कुछ होगा ही नहीं, या फिर "कुम्भ में स्नान करने के बाद, कोरोना भाग जायेगा", जैसाकि एक नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने बयानबाजी की थी.  

आपको बता दें कि पीएम केयर्स फंड से तकरीबन 55 हजार से अधिक वेंटीलटरों की खरीद की बात हुई थी, किंतु बड़ा आश्चर्य है कि यह नहीं हो सका!
जैसा कि बीबीसी ने रिपोर्ट किया है कि 1 साल बाद मात्र 30,000 वेंटिलेटर ही खरीदे जा सके!

तत्पर्य बड़ा साफ है कि हम मुक्ति पा चुके थे, और यह सोच रहे थे कि हमारी वह गति होगी ही नहीं, जो दूसरों की हुई है. इसी प्रकार से पीएम केयर्स फंड द्वारा ही तमाम राज्यों के लिए मंजूर 165 ऑक्सीजन संयंत्रों की स्थापना की रफ्तार भी गति नहीं पकड़ पाई और अस्थाई अस्पताल भी मेंटेन नहीं हो सके. 
जाहिर तौर पर हम 1 साल के श्मशान वैराग्य से मुक्ति पा चुके थे और अब हमें सब कुछ नॉर्मल लगने लगा था. इसी प्रकार से तमाम राज्य सरकारें भी, तमाम नौकरशाही भी, अदालतें भी, मीडिया भी पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो चुकी थी और अपने नित्यकर्म में लग चुकी थी. 

वैसे यह सब 'नित्यकर्म' भी ठीक ढंग से करते तो शायद भारत, आज तक तीसरी दुनिया का 'विकासशील' देश नहीं कहा जाता!

बहरहाल, रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए, किसी का कहीं से कोई कमेंट नहीं आया. 

ऐसी स्थिति में आप इस लेख की हेडिंग पर जाइए कि लापरवाही हमारे डीएनए में घुस गई है!

आज तमाम हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और दूसरी अदालतें केंद्र सरकार से, राज्य सरकार से और नौकरशाहों से जवाब तलब किए जा रहे हैं, स्वयं संज्ञान ले रहे हैं, तमाम वकील पीआईएल दाखिल कर रहे हैं, अदालतों में रो रहे हैं, तमाम याचिकाकर्ता केंद्र सरकार से - राज्य सरकारों से जवाब मांग रहे हैं, तमाम हॉस्पिटल कोर्ट का रुख कर रहे हैं, किंतु 1 साल के कोरोना वायरस के पहले कहर के बावजूद भी किसी ने तैयारियों पर ध्यान दिया क्या?

Corona Second Wave'! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Courts Role

कोई भी इस मसले को लेकर कोर्ट पहुंचा क्या?
किसी की भी आव़ाज, सिस्टम के किसी मंच पर सुनी गयी क्या?

जाहिर तौर पर यह हमारे सुसुप्त अवस्था में जा चुके डीएनए की ही बात है, नहीं तो ऐसे कैसे हम अचेत हो गए?


जवाबदेही की आवश्यकता (Accountablitiy required at each level)

यह बेहद दुख की बात है कि हमारे देश में जवाबदेही की बात नहीं होती है, बल्कि लीपापोती वाले सिस्टम के हम अभ्यस्त हो चुके हैं!

कोई भी घटना हो जाए, कुछ एक दिन तक उस पर शोर मचता है, और उसके बाद लीपापोती हो जाती है, ठन्डे बस्ते में वह मामला चला जाता है, उस पर किसी की जवाबदेही नहीं ली जाती है, और यही वह बीज है जो लापरवाही के रूप में बाद में हम सबके सामने दिखता है, और देखते ही देखते घातक हो जाता है!
खतरा चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा हो ज्योंही वह गुजर जाता है, उसके बाद हम उसे तत्काल ही भूल जाते हैं, उससे सीख लेने की बात ही कौन कहे!
परंतु यहां उस चोर की कहानी बताना लाजिमी होगा, जब उसे अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाई गई.

जब उस चोर को फांसी होनी थी, तब उसकी आखिरी इच्छा पूछी गई!

जज से उसने कहा कि वह अपनी मां से अंतिम बार मिलना चाहता है, और उसके कान में कुछ कहना चाहता है. अदालत ने उसकी इच्छा पूरी कर दी और ज्योंही उसकी मां उसके पास आईं, तब चोर अपना मुंह अपनी माँ के कान के पास लेकर आया.

ठीक तभी उसने अपनी मां के कान को जोर से काट लिया. उसकी मां दर्द से चीखने लगी, और जब चोर से पूछा गया कि उसने अपनी मां के कान को क्यों काटा, तब सजा पाए चोर ने कहा कि जब मैं छोटा था, तब एक पेंसिल चुराई थी. तब मेरी मां ने मेरी पिटाई नहीं की थी अगर मेरी मां तभी मुझे समझातीं और मुझे दंड देतीं, तब शायद मैं चोरी छोड़ देता, किंतु उन्होंने मेरी लापरवाही को अनदेखा कर दिया, उस पर लीपापोती कर दिया, उस लापरवाही के बीज को छोटा समझा और इसी कारण, धीरे-धीरे मैं बड़ा चोर बन गया!बाद में मैं और चोरियां करता गया और माँ  हमेशा ही सबको इग्नोर करती गयीं.इसी कारण मैं गलतियां पर गलतियां करता गया, जिसके कारण आज मुझे फांसी हो रही है!

यह 'तथ्य' है, जो बेशक आपको कहानी लग सकती है, किंतु जीवन के किसी भी क्षण में, किसी भी व्यवस्था में, किसी भी संस्थान में आप इसका आंकलन कर लीजिए, यहाँ तक कि  कोरोना के मामले में भी यही तथ्य है.
मद्रास हाई कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए चुनाव आयोग के निशाने पर लिया और यहाँ तक कहा कि चुनाव आयोग के अधिकारियों पर हत्या का अभियोग चलाया जाना चाहिए. जैसा कि  अपेक्षित था, चुनाव आयोग ने इस बात से पल्ला झाड़ लिया कि कानून-व्यवस्था का उससे कोई मतलब नहीं था, बल्कि कोरोना गाइडलाइन्स का पालन स्थानीय अधिकारियों के जिम्मे था.उधर राज्य सरकारों, केंद्र सरकार किसी को कुछ मतलब ही नहीं था, और कोरोना के तमाम प्रोटोकाल हर जगह टूटते रहे...

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि इन सब चीजों पर जवाबदेही तय की जाए!

Corona Second Wave'! Blame Game, irresponsibility is in our DNA, Accountability Matters

इन तमाम मामलों पर, खासकर राजनीतिक-प्रशासनिक रूप से सेकंड वेव के इस जानलेवा संकट पर वाइट पेपर जारी होना चाहिए!कहां गलतियां हुईं, क्या समस्याएं आईं, कहां हमारी सोच में प्रॉब्लम है, क्या वास्तविक समस्याएं थीं, इन सब चीजों पर रिटायर्ड जस्टिस या फिर संयुक्त संसदीय समिति, अथवा दूसरे शिक्षाविदों की जांच रिपोर्ट बनाई जानी चाहिए और उसकी सिफारिशों से पता चलना चाहिए कि कहां गड़बड़ियां हैं?

राजनीतिक तंत्र, नौकरशाही तंत्र, हेल्थ सिस्टम से लेकर हमारे एटीट्यूड में कहां कमी है और उसी के अनुरूप जिन सिफारिशों पर अमल किया जा सकता है, उस पर अमल किया जाना चाहिए, जवाबदेही तय करना चाहिए.

और हाँ! यहाँ रुकने की कतई ज़रुरत नहीं है, बल्कि उस समिति की रिपोर्ट के अनुसार ही जवाबदेह लोगों पर अभियोग चलाया जाना चाहिए. वह चाहे कोई आईएएस अधिकारी हो, वह चाहे चुनाव आयोग का कोई आयुक्त हो, वह चाहे सेंट्रल गवर्नमेंट का कोई मिनिस्टर हो या फिर प्रधानमंत्री ही क्यों ना हों, या फिर कोई हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के जज ही क्यों न हों, सभी के रोल का एनालिसिस जरूरी है.

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हालाँकि, इस संकट के बीच में तमाम उपाय हो रहे हैं, किन्तु एक बार इस महा भयानक संकट की जवाबदेही तय करने की शुरुआत हो जाए, तो यकीन मान लीजिए, आजादी के बाद जो यह सबसे शर्मनाक संकट हमारे सामने आया है, उस संकट से निपटने की राह तो हमें मिलेगी ही, साथ ही आने वाले समय में भविष्य की तमाम पीढ़ियां हमारी शुक्रगुजार भी होंगी कि अपने डीएनए में छिपी लापरवाही को हमने न केवल सही ढंग से पहचाना, बल्कि जवाबदेह बनने और बनाने का का प्रयत्न भी किया, उस पर जागरूकता फैलाई, उस पर एक्शन लिया और यहां से भारत नए युग में प्रवेश करेगा, इस बात में कोई दो राय नहीं है.

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में आपका मिथिलेश


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