कोरोना वैक्सीन पर राजनीति 'पागलपन' से कहीं अधिक 'घातक' है!

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कोरोना वैक्सीन पर राजनीति 'पागलपन' से कहीं अधिक 'घातक' है!

Politics on Corona Vaccine is dangerous, Hindi Article (Pic: rand.org)

एक तरफ दुनिया के तमाम देशों को कोरोना ने परेशान कर रखा है, वहीं हमारे देश के राजनेता वैक्सीन पर गंदी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं.
कोई वैक्सीन ना लगवाने का यह तर्क दे रहा है कि वह 'बीजेपी की वैक्सीन' है, तो कोई राजनेता खुद वैज्ञानिक बन कर यह दावा करने में लगा है कि अमुक वैक्सीन ठीक तरीके से बनाई गई है, या मानकों के अनुरूप नहीं बनाई गई है!

वहीं कोई इसकी कीमत को लेकर राजनीति कर रहा है, तो कोई इसके अंदर सूअर का मांस होने की अफवाह फैला रहा है!!

कभी-कभी लगता है कि आधुनिक दौर में हम कितने और असंवेदनशील हो गए हैं!

लाखों-करोड़ों लोग इस कोविड-19 नामक महामारी से काल के गाल में समा गए हैं और यह तो मात्र वह लोग हैं, जो सीधे-सीधे कोविड-19 के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए हैं. यह लेख लिखे जाने तक भारत में ही डेढ़ लाख से अधिक लोग काल के गाल में समा चुके हैं, वहीं विश्व भर में या आंकडा दो करोड़ से कुछ लाख ही कम है. 

यह तो रही डायरेक्ट रूप से प्रभावित होने की बात, वहीं अगर अप्रत्यक्ष रूप से बात की जाए तो विश्व भर में अरबों लोग इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, इस बात में संदेह नहीं है.
बल्कि यूं कहा जाए कि कुछ परसेंटेज छोड़ दें तो लगभग सभी इससे कहीं न कहीं और किसी न किसी स्तर पर प्रभावित रहे हैं तो अतिशयोक्ति न होगा!


ज़ाहिर है कि अवसाद की तरफ लोग तेजी से धकेल दिए गए हैं!
इकोनामी किस स्तर तक प्रभावित हुई है, यह कोई बताने की जरूरत नहीं है. विकीपीडिया पर प्रकाशित एक आँकड़े के मुताबिक लॉक डाउन के प्रथम 21 दिन में प्रत्येक दिन, 32 हज़ार करोड़ रूपये के नुक्सान का आंकलन किया गया था.

मतलब, मात्र 21 दिन में ही  6,72,000 का नुक्सान भारतवासियों को हो चुका था. अब आप खुद कल्पना कर लें कि समूचा नुक्सान कितना हुआ होगा और यही आँकड़ा जब आप वैश्विक स्तर पर ले जाते हैं तो आपका दिमाग चकराने लगेगा!

इस बीच हर तरह का व्यापार ठप सा हो गया, तो बच्चों की शिक्षा से लेकर घरेलू प्रबंधन तक की व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई!

इन आँकड़ों से इतर बात करें तो 'संवेदनशीलता' की बजाय संवेदनहीनता दिखला रहे हमारे नेतागणों के ऊपर एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि क्या वाकई हम नेता कहलाने के लायक हैं?
क्या वाकई नेतृत्व की समझ हमारे भीतर है भी या हम पूर्णतः मूर्खता और पागलपन को प्राप्त हो चुके हैं?

किसी मामले की नजाकत समझना, हर किसी की जिम्मेदारी बनती है और पोलियो जैसा विश्वव्यापी टीकाकरण अभियान, सफलतापूर्वक चलाकर हमने इसे साबित भी किया है!
लेकिन यह समझदारी कोविड-19 के वैक्सीनेशन में आखिर कहां लुप्त होती जा रही है?

बीते बिहार विधानसभा चुनाव से 'वैक्सीनेशन पर राजनीति की औपचारिक शुरुआत की गई.
एक पार्टी ने प्रदेश में फ्री वैक्सीनेशन देने का वादा किया, तो दूसरी पार्टी ने राजनीति शुरू करने का आरोप लगा डाला.

Politics on Corona Vaccine is dangerous, Hindi Article (Pic: swarajyamag.com)

इसके बाद तो राजनीति का कुछ ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि वह अब तक थम नहीं सका है!

क्या अब वक्त नहीं आया है कि अब हम इस पर राजनीति बंद करें और अगर हमारे पास कोई सुझाव है भी, तो उस पर जिम्मेदारी भरा रवैया अख्तियार करें. आखिर इन सबके लिए संबंधित अथॉरिटी को सुझाव, वह भी लिखित रूप में देने से किसने रोका है?

किसी कम्युनिटी को वैक्सीनेशन के खिलाफ भड़काने से आखिर यह महामारी किस प्रकार कंट्रोल होगी?
वैसे भी इस महामारी के नए-नए रूप, नए स्ट्रेन सामने आ रहे हैं और यह टीकाकरण भी कितना प्रभावी होगा, इसको लेकर वक्त का इंतजार ही एकमात्र रास्ता है. पर हम उस रास्ते को बंद नहीं कर सकते हैं, जो हाल फिलहाल दिख रहा है, क्योंकि यह किसी नेता के लिए एक बयान भर हो सकता है कि "अमुक" राजनीतिक कारण से वह वैक्सीनेशन नहीं कराएगा, लेकिन उसके करोड़ों समर्थकों के लिए यह किस प्रकार का नकारात्मक असर पैदा कर सकता है, यह समझना आसान नहीं है.

अमेरिका में हुई हाल ही की घटना से इसका संकेत अवश्य समझा जा सकता है, जब ट्रंप समर्थक, अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव परिणाम एक्सेप्ट करने की बजाय, अमेरिकी लोकतंत्र के प्रतीक कैपिटल हिल पर धावा बोलकर, अमेरिकी लोकतंत्र के गौरवमयी इतिहास पर काला धब्बा लगाने की पुरजोर कोशिश कर चुके हैं!
इसके पीछे ट्रम्प का चुनाव परिणाम स्वीकार न करना, एक उकसावा ही तो था?

किसी नेता का बयान, किसी नेता की इच्छा उसके समर्थकों में बड़ा प्रभाव छोड़ती है, इसलिए आइए हम सब मिलकर टीकाकरण के प्रति सकारात्मक रूख अपनाएं और उसी सकारात्मकता के साथ इस महामारी को नियंत्रित करें, क्योंकि यही समय की मांग है.


कहीं ऐसा न हो कि यह बीमारी अपने दुष्प्रभाव का दायरा इतना अधिक बढ़ा ले कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इसका आंकलन करना ही असंभव हो जाए.
क्या सच में ऐसी किसी स्थिति के लिए हमारे देश के राजनीतिक, धार्मिक और सामजिक नेता तैयार होंगे?


कहना मुश्किल है, पर आप क्या सोचते हैं, कमेन्ट-बॉक्स में ज़रूर बताएं और यह लेख अधिक से अधिक शेयर करें, ताकि वैक्सीनेशन के सन्दर्भ में बदजुबानी पर लगाम लग सके और जल्द से जल्द इस महामारी पर नियंत्रण किया जा सके!







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