महाभारत और भारत

भारतीय अर्थव्यवस्था में गिरावट की चर्चा होते होते 'महाभारत' की चर्चा होने लगी है. कभी कर्ण के सारथी रहे शल्य की चर्चा की जा रही है तो दूसरी ओर से भीष्म की चुप्पी की याद दिलाई जा रही है.

बहरहाल, इस दरमियाँ महाभारत के ही एक और पात्र की चर्चा लाजमी हो जाती है और वह है महात्मा विदुर की. राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्त्र के विद्वान माने जाने वाले विदुर का प्रसंग यहाँ 'टैक्सेशन' के सन्दर्भ में लिया जाना उपयुक्त रहेगा.

टैक्स पर महात्मा विदुर पौधे, फूल और माली का सन्दर्भ देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार माली पौधे से फूल ज़रूर तोड़ता है, किन्तु वह पौधे को उखाड़ता नहीं है. ऐसे ही टैक्स लेते समय शासक को ध्यान रखना चाहिए कि जनता की आय का साधन प्रभावित न हो. अगर जनता की आय का साधन डिस्टर्ब होता है तो जनता अपनी रक्षा के लिए झूठ और भ्रष्टाचार की ओर स्वतः ही मुड़ जाती है.

हमारे देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पिछले 70 सालों में कई सरकारें आईं गयीं, किन्तु इस बात की ज़हमत नहीं उठायी गयी कि आखिर यह भ्रष्टाचार उत्पन्न क्यों होता है और उसका इलाज क्या है.

2014 में कांग्रेस पार्टी की बड़ी हार का कारण यह भ्रष्टाचार का मुद्दा ही था, जिसमें भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और नरेंद्र मोदी का युग शुरू हुआ माना गया.

पर क्या भ्रष्टाचार की जड़ पर वाकई लगाम लग सकी है?

इस बात पर कोई मूरख भी शायद ही यकीन करे, क्योंकि जीएसटी का जो टैक्स लगा कर रामराज्य लाने की बात कही गयी, शुरूआती तौर पर वह बड़ा फ्लॉप रहा है.

खुद सरकार इस बात को स्वीकार करती दिखी है और इस लिहाज से जीएसटी कौंसिल की बैठक में बदलाव करने को तत्पर दिखी है. इसमें रिटर्न फाइलिंग, रिवर्स चार्ज में राहत के साथ कम्पोजिट स्कीम का दायरा बढ़ाया गया है. मतलब छोटे कारोबारियों के लिए इस स्कीम की लिमिट 75 लाख से 1 करोड़ तक कर दी गयी है. और भी कई तकनीकी बातों पर बदलाव की गुंजाइश दिखी है, किन्तु असल बात तकनीक से आगे की है.

देश में इस समय विपक्ष की स्थिति डांवाडोल है और अगर विपक्ष से कोई नेता अर्थव्यवस्था पर आवाज़ भी उठा रहा है तो उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जा रही है. रही सही कसर सोशल मीडिया पर समर्थक शोर मचाकर पूरी कर दे रहे हैं.

ऐसी स्थिति में अगर यशवंत सिन्हा जैसे अर्थव्यवस्था के जानकार अगर तथ्यात्मक बातें उठा रहे हैं तो उन्हें 80 साल की उम्र में नौकरी का आवेदनकर्ता बताकर आखिर किस ऐटिटूड का परिचय दिया जा रहा है? अर्थव्यवस्था की गिरावट में एक सटीक आलोचना पर झल्लाना आखिर किस भारतीय सभ्यता और लोकतंत्र का परिचायक है, वह भी तथाकथित रूप से सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री द्वारा!

इतना भी कुछ कम था, जो तथ्यात्मक आलोचना करने वाले स्कॉलर को शल्य बताकर विनम्रता और ट्रांसपेरेंसी को एक नयी ऊंचाई पर खुद प्रधानमंत्री जी लेकर चले गए.

रही बात भारत के भविष्य को सुधारने की तो भविष्य हमेशा वर्तमान पर ही निर्मित होता है. वर्तमान में बिजनेस की रीढ़ टूटेगी, वर्तमान में टैक्सेशन नियमों को फूल और माली के संबंधों के अतिरिक्त तोला जाए और कहा जाए कि भविष्य के लिए उत्तम दांव खेला जा रहा है तो यह अतिश्योक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं!

महाभारत के एक और उद्धरण की चर्चा करते हैं और यह उद्धरण धृतराष्ट्र के राजसभा से सम्बंधित है. उस राजसभा में तब दुर्योधन हावी था और द्रोण, भीष्म, विदुर सहित दूसरों की आवाज न के बराबर सुनी जाती थी. सुनी जाती थीं तो दुर्योधन की हाँ में हाँ मिलाने वाले उसके चाटुकारों की बातें या फिर उसके अहम को ही और चोटी पर पहुंचाने वाली खोखली वीरता और षड़यंत्र की बातें!

तो महाभारत से इतर क्या 'भारत' में भी ऐसे ही प्रशासन चलाया जा रहा है?

डूबते, उतराते रहिये इस महाभारत में!

वैसे भी यह महाभारत कोई चेतन भगत का उपन्यास तो है नहीं, जिसमें उपन्यास के नाम पर किसी पेज न. 57 से काम चल जाए. ठीक वैसे ही यह भारत, उसकी अर्थव्यवस्था और टैक्सेशन इत्यादि कोई एक बायस्ड मॉडल नहीं है, जिसमें कुछ नौकरशाहों या ढाई लोगों की टीम से काम चला लिया जाए.

यह तो विशाल है, व्यापक है, परिवर्तनशील तो है ही...

अतः भारत को व्यापकता के साथ प्रशासित किया जाए, विशालता के साथ आलोचना को लेकर सुधारात्मक दिशा में बढ़ा जाए. शायद तभी हम फूल और माली के बीच संबंधों को समझ सकेंगे और समझ सकेंगे महाभारत के सार को भी!

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