तुलसी चरितं - Goswami Tulsidas Story in Hindi

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तुलसी चरितं - Goswami Tulsidas Story in Hindi


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Published on 29 Jan 2023

तुलसीदास: पत्नी वियोग से लेकर राम भक्त तक

संवत् 1631 या कहें सन 1574 ई. की बात है, रामनवमी का दिन था!

इस दिन वही योग था, जैसा त्रेतायुग में श्री राम के जन्म के समय रहा था.

एक संत, भगवान राम का अनन्य भक्त ने अपनी रचना का निर्माण शुरू किया. नाम दिया गया श्रीरामचरितमानस.

इस महान ग्रंथ को लिखने में पूरे दो वर्ष, सात महीने और 26 दिन का समय लगा और संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन इसके सातों कांड पूरे हुए.

इसको लिखने वाले थे रामबोला, जो कभी अपनी पत्नी को एक दिन के लिए भी अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देते थे, लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें तुलसीदास बनना पड़ा, और वैराग को अपना कर उन्होंने इस महान ग्रंथ की रचना कर डाली.

आईए जानने की कोशिश करते हैं –

मुंह में दांत के साथ हुआ जन्म!

भक्ति रस में विभोर तुलसीदास का जन्म सावन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि, 30 जुलाई 1554 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजपुर गांव में हुआ.

ये कोई साधारण बालक नहीं था, जन्म के समय आम बालकों की तरह इस बालक ने कोई विलाप नहीं किया और इसके मुंह में दांत भी थे. कहते हैं उसके मुख से पहला नाम ‘राम’ निकला. इस कारण इस बालक का नाम भी रामबोला पड़ गया!

हालांकि, जन्म के दूसरे ही दिन इनकी माता हुलसी का देहांत हो गया और रामबोला का लालन-पालन चुनिया नाम की एक दासी ने 5 वर्षों तक किया. इसके बाद चुनिया भी इस धरती से चल बसी और फिर रामबोला एकांत अनाथों जैसा जीवन जीने को मजबूर हो गए.

रामबोला की ऐसी स्थिति देख कर श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी उनको अपने साथ अयोध्या ले आए. यहीं पर रामबोला का नाम बदलकर तुलसीदास रख दिया गया.

पत्नी रत्नावली से बेइंतेहा प्रेम

तुलसीदास की शिक्षा दीक्षा ने उन्हें एक माहिर कथाकार बना दिया था. एक दिन कथा सुनने भारद्वाज गोत्र के दीनबंधु पाठक वहां आए, वे कथाकार तुलसीदास की कथा शैली के ऐसे मुरीद हुए कि उन्होंने अपनी 12 वर्षीय पुत्री रत्नावली का विवाह तुलसीदास से करने का निर्णय ले लिया.

दीनबंधु पाठक ने विवाह का प्रस्ता‍व तुलसीदास के गुरु के समक्ष रखा और गुरु ने उनकी दादी के समक्ष, दादी ने इस विवाह प्रस्ता‍व को स्वीकार कर लिया.

पुत्री रत्नावली से संवत् 1589 के जेष्ठ माह में विवाह कर दिया गया. रत्नावली बहुत ही सुंदर थी, उनकी सुंदरता आकर्षण से परिपूर्ण थी. तुलसीदास का विवाहिक जीवन अति खूबसूरत था, वह रत्नावली से बेइंतेहा प्रेम करते थे, मोह इतना कि एक दिन के लिए भी वह अपनी पत्नी से दूर होना नहीं चाहते थे.

और एक दिन जब रत्नावली तुलसीदास को बताए बिना अपने पीहर चली गईं, तो पत्नी प्रेम में तल्लीन रहने वाले तुलसीदास व्याकुल हो उठे और वियोग – वेदना के कारण रत्नावली के गांव दौड़ पड़े.

तुलसीदास ने सुबह तक का इंतजार भी नहीं किया, तेज वर्षा और अंधेरी रात की सुध-बुध भी उन्हें नहीं रही. इधर बारिस रुक नहीं रही थी और उधर तुलसीदास भी कदम बढ़ाए जा रहे थे.

उन्होंने नदी को एक तैरती लाश के सहारे पार कर लिया और पहुंच गए रत्नावली के गांव. घर के पास पहुंचे तो, घर से सटा एक वृक्ष जिससे एक सर्प लटक रहा था, वह भी उन्हें रस्सी दिखाई दिया. उसके सहारे वह सीधे रत्नावली के कमरे में दाख़िल हो गए.

वैराग्य की ओर प्रस्थान और…

यह देख उनकी पत्नी अवाक रह गईं और लोक-लाज की दुहाई देते हुए उन्हें जाने को कहा. लेकिन तुलसीदास थे, जो टस से मस न हुए.

वह रत्नावली को अपने साथ चलने के लिए निरंतर आग्रह करते रहे. इससे रत्नावली बेहद क्रोधित हो गईं और भरे हुए मन से तुलसीदास को धिक्कारते हुए बोलीं,

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति!

नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत

तुम मेरे इस हड्डी मांस के शरीर के प्रति जितना प्रेम दिखा रहे हो, अगर उसका आधा भी स्नेह तुमने प्रभु श्री राम से किया होता तो तुम भवसागर का पार कर लेते.

ये शब्द तुलसीदास के दिल को तीर की तरह चुभे. तुलसीदास के प्रेम और देह मोह की इस प्रकार से अवहेलना ने उनकी दशा और दिशा दोनों ही बदल कर रख दीं. उन्होंने एक पल के लिए भी वहां रुकना गवारा न समझा और वहां से चले गए. उन्होंने अपना घर तक छोड़ दिया.

अब वह एक तपस्वी बन गए और तीर्थयात्रा करने निकल पड़े.

हालांकि, रामबोला का नाम तो पहले ही तुलसीदास रख दिया गया था, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद असली तुलसीदास का जन्म हुआ और वह प्रभु श्री राम की भक्ति में ऐसे लीन हुए कि अपना सर्वस्व उन्हें न्योछावर कर बैठे.

जब कृष्ण ने मानी तुलसीदास की बात!

इसी से संबंधित एक कहानी है, जिसके अनुसार एक बार वृंदावन की गलियों में घूमते हुए वह एक मंदिर पहुंचे. इस घटना का उल्लेख मूल गोसाईं चरित में किया गया है.

मंदिर में लगी कान्हां की मूर्ति बहुत सुंदर प्रतीत हो रही थी.

मंदिर के पंडा ने तुलसीदास से कई बार कहा कि वह मूर्ति के आगे अपना शीश नवाएं. हालांकि, गोस्वामी तुलसीदास मूर्ति की सुंदरता पर मोहित तो थे. किन्तु, वह कृष्ण के समक्ष नतमस्तक कैसे हो जाते.. उनके आराध्य तो श्री राम थे.

उन्होंने अपने भाव-विभोर मन को खोलकर उनके सामने रख ही दिया और कहा-

कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ।

तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान ल्यो हाथ।।

ये तो पता नहीं कि इतिहास इस बात को कितना प्रमाणित करता है, लेकिन जन श्रुतियां कहती हैं कि तुलसीदास का इतना कहना भर था कि कृष्ण की मूर्ति ने बांसुरी को छोड़कर धनुष बाण अपने हाथ में ले लिए.

पत्नी के धिक्कार से मिली राम भक्ति

पत्नी द्वारा लज्जित होने और उनके कड़वे बोल ने उनका मिलन प्रभु श्री राम से कराया, जिसके बाद तुलसीदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई.

एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसीदास गंगा नदी से नहाने के बाद एक लोटा जल का भरकर एक वृक्ष के नीचे डाल दिया करते थे, जिस पर एक प्रेत निवास करता था. एक दिन वह प्रेत तुलसीदास से बेहद प्रसन्न हुआ और कुछ मांग मांगने के लिए बोला.  तुलसीदास ने प्रभु से मिलने की अपनी इच्छा व्यक्त कर दी और प्रेत ने उनको हनुमान जी के आश्रय में जाने का सुझाव दिया.


तुलसीदास ने प्रेत के कहे अनुसार हनुमान जी को पाया और उनसे प्रभु श्री राम का पता पूछा. इस पर हनुमान जी ने तुलसीदास को चित्रकूट के घाट पर जाने का मार्गदर्शन दिया.

तुलसीदास चित्रकूट के घाट पर अपने प्रभु का इंतजार करने लगे, वह अब घाट किनारे प्रभु की राह तकते हुए चंदन घिसते रहते. इस क्रम में एक दिन उनका चंदन लेने प्रभु श्री राम साक्षात प्रकट हुए और तुलसीदास को अपने दर्शन दिए.

इससे संबंधित एक दोहा काफी प्रचलित है,

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीड़। 

तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

अगर तुलसीदास अपनी पत्नी के प्रेम मोह में न फंसे होते तो शायद उन्हें भगवान राम के दर्शन भी न होते. न हीं उनकी प्रेम भावना का दर्शन रामचरित मानस व अन्य महाकाव्य में प्रदर्शित होता. पत्नी के धिक्कारने के बावजूद भी तुलसीदास अपनी पत्नी को गुरुमाता का दर्जा देते हैं.


उनकी रचनाएं स्त्री प्रेम के कारण मिलने वाली सफलता का प्रमाण हैं.

इस तरह प्रेम और भक्ति के विरले संत गोस्वामी तुलसीदास की आत्मा प्रभु वंदना के बीच 1623 ई. को वाराणसी के अस्सी घाट पर परमात्मा में विलीन हो गई.

Goswami Tulsidas: Great Devotee of the Lord Shri Rama, Hindi Article

Goswami Tulsidas Story in Hindi

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