मुगलों के विरुद्ध भारतीय मुसलमानों के संघर्ष के प्रतीक हैं 'दुल्ला भट्टी'

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मुगलों के विरुद्ध भारतीय मुसलमानों के संघर्ष के प्रतीक हैं 'दुल्ला भट्टी'

लोहड़ी पर्व (13 जनवरी) पर विशेष

पाकिस्तान अपने हर प्रक्षेपात्र का नाम दुर्दांत हमलावर व लुटेरे मोहम्मद गौरी, गजनी पर क्यों रखता है? 
दिल्ली में औरंगजेब रोड का नामकरण एपीजे कलाम पर करने से भारतीय मुस्लिम समाज का एक वर्ग क्यों हायतौबा मचाता है? 

उत्तर स्वभाविक है कि दुनिया के इस हिस्से में रहने वाले मुस्लिम समाज के एक वर्ग को गलत पढ़ाया गया है कि हमलावर पठान व मुगल उनके आदर्श हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले मुस्लिम समाज का इनसे कोई वास्ता नहीं है और इन विदेशी हमलावरों से इस देश का मुसलमान भी उतना ही पीडि़त रहा है जितना कि हिंदू। 


पंजाब में माघ महीने की सन्क्रांति को लोहड़ी मनाई जाती है। पौराणिक इतिहास के अनुसार तो इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता राक्षसी का वध किया, परन्तु पंजाब में इस पर्व के साथ ऐसा किन्वदन्ती भरा इतिहास जुड़ा है जो बताता है कि विदेशी हमलावर जो बाद में हमारे शासक बन बैठे, किसी भी तरह से यहां के मुस्लिम समाज के हितैषी व शुभचिन्तक न थे।

 Biography of Dulla Bhatti, Hindi Article

मुगलों के शासनकाल के समय पंजाब में एक नायक हुए दुल्ला भट्टी, जिन्होंने मुगल शासकों की नाक में दम किए रखा और हमवतनों की खूब सेवा की। भारत की वाघा सीमा से पाकिस्तान में लगभग 200 किलोमीटर पार, पश्चिमी पंजाब में गांव पिंडी भट्टियां (जिसका अर्थ है भट्टियों का गांव) है। वहीं राजपूत मुसलमान लद्दी और फरीद खान के यहां 1547 में हुए राय अब्दुल्ला खान, जिन्हें दुनिया अब दुल्ला भट्टी बुलाती है। 

उनके पैदा होने से चार महीने पहले ही उनके दादा सन्दल भट्टी और बाप को मुगल सम्राट हुमायूं ने मरवा दिया। खाल में भूसा भरवा के गांव के बाहर लटकवा दिया। कारण कि उन्होंने मुगलों को लगान देने से मना कर दिया था। आज भी पंजाब की लोकगाथाओं में हुमायूं की बर्बरता के किस्से सुनने को मिलते हैं। एक लोकगीत में गायक कहता है :- 

तेर सान्दल दादा मारया।
दित्ता बोरे विच पा।
मुगलां पुट्ठियां खालां लाह के।
भरया नाल हवा।

अर्थात - गायक दुल्ला भट्टी को संबोधित करते हुए कहता है कि मुगलों ने तुम्हारे दादा सान्दल भट्टी को मरवा दिया और उलटी खाल उतरवा उसका शरीर बोरे में भर कर गांव के बाहर लटका दिया। सन्दल भट्टी वो जिनके नाम पर नाम पड़ा था, सन्दल बार का। दुल्ला भट्टी उस जमाने के योद्धा थे। 

अकबर उन्हें डकैत कहता था। वो अमीरों से, अकबर के जमींदारों से, सिपाहियों से सामान लूटते और गरीबों में बान्टते। इस तरह वो अकबर की आन्ख की किरकिरी थे, इतना सताया कि अकबर को आगरा से राजधानी लाहौर बदलनी पड़ी। लाहौर तब से पनपा है, जो आज तक बढ़ता गया। पर सच तो ये रहा कि हिन्दुस्तान का शहंशाह भयभीत था दुल्ला भट्टी से। 

पंजाब में कहानी कही जाती है कि एक बार सलीम थोड़े से सैनिकों के साथ भटक रहा था तो दुल्ला भट्टी ने पकड़ लिया पर कुछ किया नहीं। यूं ही छोड़ दिया, ये कहकर कि दुश्मनी बाप से है, बेटे से नहीं। पाकिस्तानी पंजाब में कहानियां चलती हैं कि पकड़ा तो दुल्ला ने अकबर को भी था। जब पकड़ा गया तो अकबर ने कहा, 'भईया मैं तो शहन्शाह हूं ही नहीं, मैं तो भाण्ड हूं।' दुल्ला भट्टी ने उसे भी छोड़ दिया ये कहकर कि भाण्ड को क्या मारूं और अगर अकबर होकर खुद को भाण्ड बता रहा है तो मारने का क्या फायदा?

लोहड़ी तो इसलिए मनाई जाती है क्योंकि भगवान् कृष्ण ने लोहिता राक्षसी को मारा, जब वो गोकुल आई थीं। फिर दुल्ला भट्टी लोहड़ी से कैसे जुड़ गए? 
इसका भी एक किस्सा है। 

लाहौर के आसपास एक गांव में सुन्दरदास नामक किसान था। उस दौर में सन्दल बार में मुगल सरदारों का आतंक था। सुन्दरदास की दो बेटियां थीं सुन्दरी और मुन्दरी। गांव के नम्बरदार की नीयत लड़कियों पर ठीक नहीं थी। वो सुन्दरदास को धमकाता व बेटियों की शादी खुद से कराने को दबाव डालता। सुन्दरदास ने किसी तरह दुल्ला भट्टी तक संदेश पहुंचाया। दुल्ला भट्टी नम्बरदार के गांव जा पहुन्चा। उसके खेत जला दिए। लड़कियों की शादी वहां की जहां सुन्दरदास करना चाहता था। केवल इतना ही नहीं दुल्ला भट्टी ने लड़कियों का खुद कन्यादान किया और शगुन में शक्कर दी। 

वो दिन है और आज का दिन, लोहड़ी की रात को आग जलाकर वही घटना दोहराई जाती है। उसी तरह शक्कर, गुड़, रेवड़ी, मुंगफली, मक्की के दाने, तिल के लड्डू पहले अग्नि को भोग लगाए जाते हैं, और बाद में इनका प्रसाद वितरित किया जाता है। 
केवल इतना ही नहीं हर नवविवाहित जोड़ा पवित्र अग्नि में तिल-फूल भेंट कर दुल्ला भट्टी के प्रति कृतज्ञता जताता है। मौके पर मौजूद सभी लोग उसी घटना को लेकर सामूहिक रूप से गीत गाते हैं:

सुन्दर मुन्दरिए ...हो
तेरा कौन विचारा...हो
दुल्ला भट्टीवाला...हो
दुल्ले दी धी ब्याही ...हो
सेर शक्कर पाई ...हो
कुड़ी दा लाल पताका ...हो
कुड़ी दा सालू पाटा ...हो
सालू कौन समेटे ...हो
मामे चूरी कुट्टी ...हो
जिमींदारां लुट्टी ...हो
जमींदार सुधाए ...हो
गिन गिन पोले लाए ...हो
इक पोला घट गया
जिमींदार वोहटी ले के नस गया
इक पोला होर आया
जिमींदार वोहटी ले के दौड़ आया
सिपाही फेर के ले गया
सिपाही नूं मारी इट्ट
भावें रो ते भावें पिट्ट
साहनूं दे लोहड़ी 
तेरी जीवे जोड़ी
साहनूं दे दाणे तेरे जीण न्याणे

कहते हैं अकबर की 12 हजार की सेना दुल्ला भट्टी को न पकड़ पाई थी, तो सन् 1599 में धोखे से पकड़वाया। आनन-फानन फांसी दे दी गई। लाहौर के पास मियानी साहिब कब्रगाह में अब भी दुल्ला की कब्र है।



कौन हैं भट्टी राजपूत?

विकीपीडिया के अनुसार, भाटी अथवा भट्टी भारत और पाकिस्तान के राजपूत कबीले हैं। भाटी राजपूत (जिसे बरगला भी कहा जाता है) चंद्रवंशी मूल के होने का दावा करते हैं। भाटी कबीले द्वारा कभी-कभी अपने पुराने नाम यादवपती, जो कृष्ण और यदु या यादव से उनके वंश को दर्शाते थे, का भी प्रयोग किया जाता है। भाटी राजपूत, जादम के वंशज हैं। 12वीं सदी में भाटी राजवंश ने जैसलमेर पर शासन किया। ये लोग ऊंट सवार, योद्धाओं और मवेशी चोरी और शिकार के शौकीन थे। रेगिस्तान में गहरे स्थित होने के कारण, जैसलमेर भारत में मुस्लिम विस्तार के दौरान सीधे मुस्लिम आक्रमण से बच गया था, लेकिन कुछ भाटी खानाबदोश मवेशी रखने वाले थे। 1857 के विद्रोह से पहले के कुछ वर्षों में, इन समूहों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किए गए फैसलों के कारण अपनी जमीन खो दी थी, जो कि जाट किसानों को चराई वाले भूमि को पूर्व में दिल्ली और हरियाणा क्षेत्रों में भाटियों द्वारा आवृत करती थी। बहुत से खानाबदोश भट्टियों ने किसी ने किसी तरह इस्लाम कबूल कर लिया। दुल्ला भट्टी का परिवार भी इन्हीं में से एक था। पंजाब का भाटी राजपूतों से जुड़ा गौरवशाली इतिहास रहा है। भाटी राजाओं ने ही मालवा में शासन किया और किलों का निर्माण करवाया। पंजाब का भटिण्डा किसी समय भटनेर के नाम से विख्यात रहा है।

- राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी, वीपीओ लिदड़ां, जालंधर।
संपर्क : 77106-55605





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