राधा प्रेम-प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ी अपनी बांसुरी?

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राधा प्रेम-प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों तोड़ी अपनी बांसुरी?

Shri Krishna, Shri Radha and Flute Story in Hindi (Pic: sadhguru.org)

राधा कृष्ण का नाम जब भी आता है, तो उनके साथ बांसुरी का नाम भी जरूर आता है!
पर आपको जानकर हैरानी होगी कि खुद श्रीराधा के कारण भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाना छोड़ दिया था. श्रीकृष्ण, राधा और बांसुरी,  इन तीनों का मेल अद्वितीय था. राधा से अनंत प्रेम के पीछे बांसुरी का भी उतना ही योगदान माना जाता है.
हालांकि कई लोग श्रीराधा को काल्पनिक मानते हैं, किंतु हकीकत यही है कि श्रीराधा का नाम श्रीकृष्ण के साथ वैसे ही अमिट, है जैसे सूर्य के साथ प्रकाश और चंद्र के साथ शीतलता!

यह एक तथ्य है कि महाभारत की वेद व्यास रचित सबसे प्रमुख किताब में श्री राधा का वर्णन नहीं मिलता है. इतना ही नहीं हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत में भी राधा का वर्णन नहीं है, संभवतः इसीलिए उन्हें साधारण सी कोई गोपी मान लिया जाता है, परंतु ब्रह्म वैवर्त पुराण और कवि जयदेव के लेखन में दो पुराण ऐसे हैं, जहां राधा के चरित्र का वर्णन विशद रूप में मिलता है. गीत गोविंद और चैतन्य चरणामृत नामक किताबों में भी राधा और कृष्ण कथा का वर्णन व्यापक है. इतना ही नहीं पद्मपुराण में तो भगवान श्री कृष्णा का यह कथन है कि अगर किसी के मुख से 'रा' सुनता हूं, तो उसे मेरी भक्ति मिल जाती है और 'धा' सुनने पर मैं लोभ के वशीभूत होकर उसके पीछे हो लेता हूं.
ब्रह्म वैवर्त पुराण में तो यहां तक कहा गया है कि श्री कृष्ण गोलोक धाम में जब रहा करते थे, तब श्री राधा के साथ उनकी दूसरी रानियां भी रहा करती थीं.
आपको शायद पता न हो, किंतु गोलोक धाम, बैकुंठ धाम से भी उच्चतर श्रेणी का माना गया है.

पर इस कथा में मूल प्रश्न यह है कि श्रीकृष्ण ने बांसुरी क्यों तोड़ी?
बताते हैं कि श्री कृष्ण की एक और पत्नी थीं और उनका नाम था विराजा. उनको भगवान बहुत सम्मान दिया करते थे. एक बार जब श्री कृष्णा अपनी पत्नी विराजा से मिलने गए, तो राधा भी उनके पीछे पीछे चली आईं. भगवान श्री कृष्ण विराजा के महल में प्रवेश कर गए, किंतु श्री राधा को महल के द्वारपाल श्रीदामा ने दरवाजे पर ही रोक लिया. इससे राधा बहुत कुपित हुईं और उन्होंने श्रीदामा को तत्काल श्राप दे दिया.

यह श्राप बड़ा ही कठोर था और उसके अनुसार सुदामा को असुर कुल में जन्म लेना पड़ता!
श्रीदामा भी भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त था और इस अनायास शॉप से उसे क्रोध आ गया. 

क्रोध में उसने श्री राधा को भी शाप दे दिया कि भगवान श्रीकृष्ण से उनका 100 वर्षों के लिए विरह हो जाएगा.

प्रभु की माया विचित्र है. देखिये, किस प्रकार भगवान श्री कृष्ण के दो अनन्य भक्त एक दूसरे को प्रभु से श्राप के माध्यम से दूर कर चुके थे. क्रोध से मुक्त होने पर चेतना लौटी और ऐसे में फिर भगवान श्री कृष्ण के पास जाने पर दोनों को शाप से मुक्ति का मार्ग प्राप्त हुआ.

उसके अनुसार श्रीदामा, धरती पर असुर राज बनते और उनका श्रीकृष्ण द्वारा वध होने के बाद उन्होंने मुक्ति मिल जाती. वहीं श्री राधा धरती पर अवतार लेतीं और कुछ वर्षों के बिरह के बाद उनका भी श्राप कट जाना था. आपको याद होगा कि महाभारत काल में शंख चूर्ण नामक असुर का जन्म हुआ था, जो वास्तव में श्रीदामा ही थे. 
वहीं श्री राधा वृषभानु और कीर्ति की पुत्री के रूप में प्रकट हुई थीं. 

यूं राधा के चरित्र को कई लोग महारानी रुक्मणी से भी जोड़ते हैं और उसके पीछे तर्क देते हैं कि श्रीकृष्ण लीला की चर्चित परंपरा में जब श्रीराधा का जिक्र खत्म होता है, उसके तत्काल बाद ही रुक्मणी का जिक्र आरंभ होता है.
इस व्याख्या को छोड़ भी दिया जाए, तो एक दूसरी कथा कहती है कि जब भगवान श्री कृष्ण बालक थे तो राक्षसी पूतना उन्हें मारने के लिए ब्रज में आई थी. वहीं दूसरी तरफ श्री लक्ष्मी ने भी कृष्ण की सहायता के लिए ब्रज में जन्म लिया था.
पूतना ने पहले श्रीलक्ष्मी को ही उठाया, किंतु उन्होंने अपना वजन इतना अधिक बढ़ाया कि पूतना ने उन्हें घबरा कर फेंक दिया. एक सरोवर में कमल के ऊपर जाकर श्रीलक्ष्मी गिर गईं और वही वृषभानु ने उस बच्ची को उठाकर अपनी पत्नी कीर्ति की गोद में रख दिया. इसके अनुसार, श्रीराधा और रुक्मणी एक ही थीं. हालांकि भागवत की महान कथा में इसका जिक्र सीधे तौर पर नहीं आता.

बहरहाल, महाभारत का युद्ध जब समाप्ति की ओर था, उस समय श्रीराधा का श्राप कट गया था, और कहा जाता है कि तब ब्रज से निकलकर भगवान श्री कृष्ण से मिलने राधा द्वारका की ओर निकली थीं.


हालांकि अब वह बूढ़ी हो चुकी थीं और लंबा सफर तय करने के बाद जब वह भगवान श्री कृष्ण के महल में पहुंची तो वहां एक कोने में खड़ी हो गईं. भगवान श्री कृष्ण की नजर बाद में उन पर पड़ी और अचानक दोनों की आंखों से आंसू निकलने लगे.

क्योंकि द्वारका में राधा की कोई पहचान नहीं थी, इसीलिए एक देविका के रूप में राधा की नियुक्ति भगवान श्री कृष्ण ने कर दी थी. कहते हैं इसका प्रस्ताव स्वयं श्रीराधा ने ही दिया था, ताकि वह श्रीकृष्ण के दर्शन का लाभ उठाती रहें. श्रीकृष्ण ने भी प्रस्ताव को मान लिया, परंतु भगवान श्री कृष्ण के पास कई रानियां और दासियाँ थीं, इसलिए पहले की भांति वह राधा उनके नजदीक जा नहीं पाए.

इससे श्रीराधा को भ्रम उत्पन्न हो गया कि भगवान श्रीकृष्ण उन्हें भूल चुके हैं और ऐसे में राधा ने महल का त्याग कर दिया.

चलते-चलते भगवान श्री कृष्ण का नाम लेते हुए राधा एक स्थान पर गिर गयीं और यही उनका अंतिम समय था. ठीक तभी भगवान का दर्शन हुआ!
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वह आखिरी बार भूलोक में मिल रहे हैं, और राधा से उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा प्रकट करने को कहा!
श्री राधा ने अंतिम बार श्री कृष्ण को बांसुरी बजाने का निवेदन किया और भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी सुनते-सुनते उन्होंने अपनी आंखों को बंद कर लिया.

उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे और श्री राधा पुनः अपने लोक जा चुकी थीं.

कहते हैं श्री कृष्ण के हाथों से बांसुरी छूटकर टूट गई थी और उसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने कभी भूलोक में बांसुरी नहीं बजाई.




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