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MSP - जो किसान मांग रहा है वो सरकार दे रही है, फिर कहाँ उलझ रही है कड़ी ?

How To Know About  MSP



पिछले कुछ दिनों से चल रहे देशव्यापी किसान आंदोलन सुलझने के बजाय उलझते जा रहा है। इस आंदोलन में मुख्यरूप से पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल हो रहे हैं। वहीं अपेक्षाकृत अन्य राज्यों के किसान इस आंदोलन को लेकर सुस्त हैं ... इसकी वजह अब किसी से छुपी हुई नहीं है। 

बात करें MSP की तो MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य।  इसका मतलब यह हुआ कि किसी फसल की वह कीमत जो सरकार के हिसाब से न्यायोचित, तार्किक और स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से भी फ़सल की लागत का डेढ़ गुना है। अब जब सरकार यह लिखित में देने को तैयार है कि किसानों को उनकी फ़सल का डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए और  लिखित में MSP पर आश्वासन देने को तैयार है। वहीं किसान भी तो यही मांग रहा है कि 'मोदी सरकार उनको गारंटी दे कि आने वाले भविष्य में उनकी फसल को चाहे सरकार हो या व्यापारी या फिर कंपनी कोई भी ख़रीदे लेकिन MSP या उससे ऊपर दाम पर ही खरीदे। तो फिर पेंच कहाँ फंस रहा है ?

दरअसल किसान की मांग और सरकार के आश्वासन के बीच बेहद बारीक़ लाइन है जिसे समझना बेहद जरुरी है। सरकार MSP के पुराने सिस्टम को जारी रखना चाह रही है जबकि किसान MSP का नया सिस्टम चाहते हैं। इसके पीछे वजह यह है कि MSP के मौजूदा सिस्टम में  केंद्र सरकार MSP तो कुल 23 फसलों की घोषित करती है लेकिन खरीदती मुख्य रूप से दो फसल है गेहूं और धान/चावल, वो भी कुल पैदावार का 32 फ़ीसदी प्रतिशत। यहाँ स्पष्ट कर दें कि सरकार हर फसल नहीं खरीदती। ऐसे में किसान के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है कि अगर कोई निजी व्यापारी या कंपनी उसकी फसल को औने पौने दाम पर खरीद रही है तो वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी फसल सरकार को बेच दे।  इसलिए किसान इस मामले में सिस्टम को मजबूत बनवाना चाहते हैं। 

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