बिजनेस में 'टारगेट-मार्केट' कैसे डिफाइन करें?

वर्तमान समय में इकोनामी को देखते हुए किसी भी व्यापार या स्टार्टअप के लिए 'टारगेट-मार्केट' बेहद आवश्यक हो गया है। अगर आप हर किसी को टारगेट करने के बारे में सोच रहे हैं तो निश्चित रूप से आपके बिजनेस के फेल होने के चांसेस बढ़ जाएंगे। चूंकि डिजिटल-एज में किसी भी चीज को प्रमोट करने के लिए आपको मार्केटिंग पर एक भारी-भरकम बजट इन्वेस्ट करना पड़ता है, तो उसका आरओआई (ROI) भी आपको कैलकुलेट करके चलना पड़ता है।

आपको हर-हाल में अपने इन्वेस्टमेंट का आउटपुट-रिटर्न लेना होता है, अन्यथा आपके घाटे में जाने की शुरुआत हो जाती है।

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टारगेट-मार्केट में लोकेशन से लेकर एज ग्रुप, जेंडर ही नहीं, बल्कि पोटेंशियल मार्किट की 'इनकम-रेंज' तक शामिल होती है। इसके पीछे का गणित समझना इतना मुश्किल नहीं है। कल्पना करें कि आप फोर व्हीलर की मार्केटिंग करने जा रहे हैं, किन्तु जिस ऑडियंस के बीच में आप अपना एफर्ट कर रहे हैं, उनकी सालाना इनकम काफी कम है तो लाख विज्ञापन और एफर्ट के बाद भी आपको असफल ही होना है।
सिर्फ इनकम-रेंज ही नहीं, बल्कि टारगेट कस्टमर का एजुकेशन लेवल, मैरिटल और फैमिली स्टेटस उनका सोशल बैकग्राउंड इत्यादि इसमें इंक्लूड होती है।

आइये देखते हैं कुछ महत्वपूर्ण पॉइंट्स-


करंट कस्टमर बेस देखिए 

आपके बिजनेस में करंट-कस्टमर बेस क्या है, इसे समझना आवश्यक है। फिर आप अपने करंट कस्टमर-बेस और खुद के प्रोडक्ट/ सर्विस में कॉमन इंटरेस्ट ढूंढिए! इसी आधार पर आप सेगमेंटेशन की प्रक्रिया अपना सकते हैं, मतलब कॉमन इंटरेस्ट में भी छोटे-छोटे ग्रुप्स बना सकते हैं। इसके लिए आप ज्योग्राफिकल, डेमोग्राफिकल, साइकोग्राफिक और बिहेवियरल मेथड्स ज़रूर अपनाएं।

फिर इसको गहराई में जाकर चेक करें कि क्या उक्त मॉडल आपके लिए फायदेमंद हो सकता है?

इसी प्रकार अपने कॉम्पिटिटर की एनालिसिस कीजिए। देखिये और समझिये कि वह किसे टारगेट कर रहे हैं? उनका करंट कस्टमर बेस क्या है?

रूकिये, अपने कॉम्पिटिटर को समझने का यह मतलब नहीं है कि आप अंधाधुंध ढंग से उन्हें कॉपी करने लग जाएँ। अगर आप भी सेम टू सेम  वही करते हैं जो वह कर रहे हैं तो सफल होने के चांसेस कम हो जाएंगे। फिर प्रश्न उठता है कि ऐसे में क्या करें तो यहीं उत्तर आता है टारगेट-मार्किट का! आपको कंपटीशन की एनालिसिस करके टारगेट-मार्किट को बेहतर ढंग से पकड़ना है। यहाँ बेहतर का मतलब है ज्यादा वैल्यू देना, ज्यादा स्पेसिफिक ढंग से पकड़ना।

आप का प्रोडक्ट/ सर्विस किस ऑडियंस को सूट करता है?

जी हां! आप जहां अपनी सर्विस या प्रोडक्ट सेल करना चाहते हैं, क्या उस जगह पर यह चीज बिक सकती है?
इसके लिए आपको तमाम पॉइंट पेन डाउन करने होंगे। अगर आवश्यकता होती है तो इसके लिए आपको ग्राउंड सर्वे भी करना चाहिए और यकीन मानिए यह एक ऐसी रिसर्च है जो आपके टारगेट मार्केट को पकड़ने में बेहतर मदद करेगी।

इसके लिए कस्टमर की मानसिकता को पकड़ना भी आवश्यक है। जैसे टारगेट ऑडियंस की पर्सनालिटी, एटीट्यूड, उसकी वैल्यू, इंटरेस्ट - रुचियां, लाइफस्टाइल इत्यादि को बारीकी से समझना आवश्यक होता है।
इससे आप अपने प्रोडक्ट या सर्विस की कस्टमर के माइंड में पोजिशनिंग भी समझ सकते हैं, जो पहले से है या फिर बाद में होगी।

खुद से जरूर पूछें!

क्या जिस टारगेट मार्केट को आप यूज कर रहे हैं वहां पर पर्याप्त लोग आपकी क्राइटेरिया पर फिट बैठते हैं?
क्या वाकई आप का प्रोडक्ट या सर्विस उन लोगों को बेनिफिट दे रही है जिनको आप सेल करना चाहते हैं?
इसी प्रकार से आप खुद से प्रश्न पूछिए कि क्या जिनको आप अपने प्रोडक्ट या सर्विस बेचने जा रहे हैं, वह उसे अफोर्ड कर सकते हैं?

क्या उन तक आप अपने संदेश, अपने विज्ञापन को आसानी से पहुंचा सकते हैं? माने, कहीं ऐसा तो नहीं कि आप ऑनलाइन मार्केटिंग कर रहे हों और उनके पास उसे देखने के लिए, उससे इनफ्लुएंस होने के लिए कोई मीडियम ही नहीं हो, मसलन स्मार्टफोन इत्यादि।

ज़ाहिर तौर पर अगर यह सारी बातें आप खुद से पूछते हैं तो आपको कई प्रश्नों के उत्तर आसानी से मिलेंगे और इसी के सहारे आप वह कर सकते हैं जो किसी भी बिजनेस के लिए अति आवश्यक होता है और वह है मार्केट टारगेट करना। मार्किट टारगेट करने के साथ-साथ ब्रांड पोजिशनिंग और रेकॉलिंग को भी आप समझते जायेंगे और तब सफलता के चांसेज निश्चित तौर पर बढ़ जायेंगे।

 - मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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