महिलाओं को लेकर हमारे समाज की सोच आखिर किधर जा रही है?

यह केवल हमारे भारतीय समाज की ही बात नहीं है, बल्कि इस देश से बाहर भी कमोबेश यही हालत है. पिछले दो हफ़्तों से भी अधिक समय से हॉलीवुड के हार्वी वाइंस्टीन का मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है. हॉलीवुड में हुए इस खुलासे से दुनिया सन्न रह गयी है कि क्या वाकई ऐसा भी हो सकता है?

अमरीकी अभिनेत्री रोज़ मैकगोवान द्वारा इस हॉलीवुड मुग़ल पर लगाए गए बलात्कार के आरोप अभी धुंधले भी नहीं पड़े कि दूसरी कई अभिनेत्रियों ने ऐसे ही आरोप इस धन और ताकत के मद में चूर व्यक्ति पर मढ़ डाले!
हालाँकि, अमरीका और ब्रिटेन में पुलिस ने इसकी जांच शुरू कर दी है, पर जांच में पैसे और पावर का किस प्रकार दुरूपयोग होता है, इस बात को कौन नहीं जानता भला!

हार्वी वाइंस्टीन के अलावा बात करें तो इसी सन्दर्भ में #Metoo कैम्पेन में शामिल हज़ारों-लाखों सेलिब्रिटीज और आम लडकियां समाज की सोच को ही तो सामने रख रही हैं. कुछ लोगों को यह बेहद आम लग रहा होगा, किन्तु यह कितना आम है और कितना घिनौना, यह बात विचारणीय है!

इसी कड़ी में बात बॉलीवुड की भी कर लें. हाल के दिनों में अपने संजीदा अभिनय से सुर्खियां बटोरने वाले एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी आत्मकथा 'An Ordinary Life' लॉन्च की थी. ऑटोबायोग्राफी लिखने में यूं तो कोई बुराई नहीं है, किन्तु उसमें अनर्गल प्रेम-संबंधों का ज़िक्र जिस गर्व से नवाज़ साहब ने किया है उसमें अवश्य कई लोगों को बुराई नज़र आयी है. कथित रूप से पूर्व प्रेमिकाओं की आपत्ति के बाद नवाजुद्दीन के खिलाफ वीमेन कमीशन में कम्प्लेन दर्ज हो गयी है.
मतलब... कुछ भी!

हालत यहाँ तक आ गयी है कि किसी भी महिला के खिलाफ कुछ भी बोल दो... कुछ भी लिख दो और हार्वी वाइंस्टीन की तरह कुछ भी कर दो?

समाज आखिर किस दिशा में बढ़ रहा है, कम से कम इस बात की तरफ तो विचार किया ही जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमारी संस्कृति में कही उस उक्ति का अर्थ तो बिल्कुल उल्टा हो जायेगा, जिसके अनुसार-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः

कम से कम कुछ तो मर्यादा रखी जानी चाहिए और कुछ तो दायरे में खुद को लाने के प्रति सजग होना चाहिए.
अन्यथा परिणाम क्या होगा, स्वतः विचार किया जा सकता है.

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