द ब्लैक प्रिन्स

अपने आप में अनोखी है 'ब्लैक प्रिन्स' यानी महाराजा दिलीप सिंह की कहानी!
महाराजा दिलीप सिंह को सिर्फ 5 साल की आयु में ही राजगद्दी पर बैठाया गया और बहुत जल्दी ही उन्हें गद्दी से हटा भी दिया गया।
इतना ही नहीं, इन्हें अपनी माँ और अपने वतन से बहुत दूर इंग्लैण्ड भेज दिया गया।
आइये जानते हैं इनकी कहानी को...

दिलीप सिंह का जन्म 6 सितंबर 1838 को 'महाराज रणजीत' सिंह और 'महारानी जिंद कौर' के यहाँ हुआ था। ज्ञात हो कि महाराजा रणजीत सिंह भारत के सर्वश्रेष्ठ योद्धा में शुमार किये जाते हैं। महाराजा रणजीत सिंह की मौत की वजह से खाली राजगद्दी पर मात्र 5 साल की उम्र में ही दिलीप सिंह को बैठा कर महाराज घोषित कर दिया गया।

The Black Prince Maharajah Duleep Singh (Pic: english...)

पंजाब प्रान्त को राजा तो मिल गया लेकिन एक शक्तिशाली योद्धा को खोने के बाद पंजाब प्रांत दुर्बल हो चुका था। ठीक उसी वक्त पंजाब प्रांत को अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया।

यहां तक तो एक साधारण कहानी है क्योंकि उस समय अंग्रेजी द्वारा किसी राज्य को हड़पना और कब्जे में ले लेना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन यहां से कहानी कुछ अलग हो जाती है, क्योंकि यहाँ ना केवल 5 साल के राजा दिलीप सिंह को गद्दी से हटाया जाता है बल्कि एक साजिश के तहत उनको देश से दूर भी कर दिया जाता है।

अंग्रेजों द्वारा महाराज दिलीप सिंह को इंग्लैंड भेज कर इनकी परवरिश पूरी की पूरी अंग्रेजी तरीके से करनी शुरू कर दी जाती है, ताकि उनके दिल और दिमाग से अपनी सभ्यता और संस्कृति मिट जाए। अंग्रेज अपने इस मनसूबे में काफी हद तक सफल भी हो चुके थे क्योंकि अंग्रेजों के संरक्षण में रहते-रहते दिलीप सिंह पूरे अंग्रेज जैसे ही बन चुके थे।

कहा तो यहाँ तक जाता है कि महारानी विक्टोरिया खुद उनका विशेष ख्याल रखती थीं और उन्होंने ही उन्हें 'दी ब्लैक प्रिंस' का नाम दिया था। दिलीप भी अपने आप को पूरी तरीके से अंग्रेज मानते थे और वह बड़े शानो-शौकत से अंग्रेजी लाइफस्टाइल को एंजॉय भी कर रहे थे।

लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। नेपाल में जीवन यापन कर रहीं उनकी माता द्वारा अपने बेटे से मिलने की ज़िद्द पर उनकी मुलाकात का इंतेज़ाम अंग्रेजों द्वारा करना पड़ा। इस मुलाकात में दिलीप सिंह की माता ने उनके अंदर के राजा के एहसास को जगा दिया। अपने खोये हुए राज्य को पाने तथा उनके पिता की वीरता के बारे में भी उन्होंने बताया। उस समय इनकी उम्र लगभग 17 साल के आसपास रही होगी।

अपनी मां से मिलने के बाद अपनी सभ्यता और अपने खोए हुए राज्य के एहसास ने दिलीप सिंह के अंदर का जमीर को जगा दिया। इसके बाद उनका मन फिर अंग्रेजी विलासिता में नहीं लगा और वह अपने वतन और अपने राज्य के लिए तड़पने लग गए। इसके लिए उन्होंने समुद्र के रास्ते भारत आने की कोशिश भी की लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ कर नजरबंद कर दिया। कहा जाता है कि इस दौरान दिलीप सिंह ने कई बार भारत आने का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो पाए।

ताउम्र अंग्रेजी जिंदगी जीने वाले दिलीप सिंह में किशोर होते-होते अपने सिख होने का गुमान लौट ही आया लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी। अंग्रेजों ने उनके ऊपर कड़े पहरे लगा रखे थे ताकि वो किसी भी प्रकार पंजाब ना पहुँच जाएँ।

अपने वतन वापस लौटने के जद्दोजहद में दिलीप सिंह पेरिस के लोकल होटल के मृत पाए गए। मरने के बाद भी अंग्रेजों को विद्रोह की इतनी आशंका थी कि उन्होंने दिलीप सिंह की अंतिम संस्कार को ईसाई रीति-रिवाजों से करवाया और यह मैसेज देने की कोशिश करी कि दिलीप सिंह ईसाई बन चुके हैं।

हालाँकि दिलीप सिंह की आखिरी इच्छा थी कि उनके पार्थिव शरीर को उनके वतन भेज दिया जाए, लेकिन अंग्रेज जानते थे कि विद्रोह बढ़ जाएगा इसलिए उन्होंने लोगों के मन में अपने राजा के लिए नफरत भरने के लिए उनको इंग्लैंड में ही दफना दिया।

अपने देश के लिए कुछ भी ना कर पाने के बावजूद दिलीप सिंह मरते-मरते यह साबित कर गए कि वह सिक्ख हैं जो हर कीमत पर अपने वतन को प्यार करता रहा।

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Web Title: The Black Prince Maharajah Duleep Singh Article In Hindi

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