सनातन धर्म के 16 संस्कार

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सनातन धर्म के 16 संस्कार

Rituals of Sanatan Dharma, Solah Sanskar in Hindi, Parenting Tips (Pic: rgyan.com)


सनातन धर्म में प्राचीन समय से ही आस्थाओं का बड़ा महत्त्व समझा गया है!

ये आस्थाएं वस्तुतः समाज व व्यक्ति की भलाई के लिए बनाये गए नियम ही थे, जो कालांतर में अपने उद्देश्यों से भटक गए और मनुष्य उसका मतलब भूलता चला गया. पर यह ज़रूर जान लें कि सनातन धर्म के वैज्ञानिक आधार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने पहले थे, बस उसे सही अर्थों में समझने की आवश्यकता है.



यह बताना आवश्यक है कि सनातन धर्म के 16 संस्कारों को सामाज शास्त्री एवं मनो वैज्ञानिक इत्यादि भी बेहद उपयोगी मानते हैं.

सनातन दर्शन के अनुसार, जीवन मुख्यतः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास रुपी चार आश्रमों में विभाजित किया गया है. इन्हीं आश्रमों में जीवन व्यतीत करते हुए प्रत्येक मनुष्य को 16 संस्कारों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है. इन संस्कारों के बगैर मानव जीवन का सफल होना पूर्ण रूप से संदिग्ध है.

महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने इन नियमों की रचना की है.

उनके अनुसार ठीक करना, दुरुस्ती, सुधार, दोष, त्रुटि को निकालना, मन में सकारात्मक विचारों को रखना व उन्हें उत्पन्न करना, पवित्रता, संवर्धन, शिष्टता, रिवाज़, धार्मिक कृत्य इत्यादि तमाम संस्कारों के ही भाग हैं.

सनातन धर्म में वर्णित 16 संस्कारों का पालन करने से गुणों में वृद्धि होती है व जीवन सफलता की ओर अग्रसर हो जाता है.

वैसे बता दें कि महर्षि अंगिरा द्वारा 25 संस्कार बताये गए हैं, तो कुछ शास्त्रों में 48!

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हालाँकि, सर्वाधिक सटीक महर्षि वेद के 16 संस्कारों का महत्त्व ही सनातन धर्मी मानते हैं. आइये इन पर नज़र डालते हैं...

1. गर्भाधान

योग्य एवं आदर्श संतान प्राप्ति हेतु यह प्रथम संस्कार है. गृहस्थ जीवन में प्रवेश के पश्चात इसे प्रथम क‌र्त्तव्य भी कहा जाता है. 

कहते हैं कि 'जन्मना जायते शुद्रऽसंस्काराद्द्विज उच्यते'. 

यानि जन्म से सभी शुद्र होते हैं, और संस्कारों द्वारा ही व्यक्ति को द्विज बनाया जाता है.

सामान्य दृष्टि से भी देखें तो जन्म के पहले स्त्री व पुरुष को अपनी सेहत एवं मानसिक अवस्था का माप करना आवश्यक है तथा नियम, तिथि, नक्षत्र के अनुरूप ही गर्भधारण करने को प्राथमिकता देनी चाहिए.

ज़ाहिर तौर पर अगर माता-पिता स्वस्थ होंगे तो शिशु निरोग व गुणवान होगा ही और इसे मेडिकल साइंस भी तो स्वीकारता है. 

 2. पुंसवन

सामान्य घरों में भी गर्भवती महिला के आहार - व्यवहार, चिंता इत्यादि भावों को संतुलित रखने का प्रयास किया जाता है. माता की गोद भराई जैसी रस्में इसका उदाहरण हैं. 

यूं भी खान-पान, सकारात्मक वातावरण, बड़ों का आशीष किसे खुश नहीं करेगा भला!

पुंसवन संस्कार में कुल नौ माह के भीतर आध्यात्मिक क्रिया कलाप,  पूजा पाठ, व दूसरे कर्म कांड करवाए जाते हैं, जिससे शिशु तेजयुक्त पैदा होता है. 

रोजाना गीता - रामायण सदृश ग्रंथों का अध्ययन होने वाले शिशु के विचार तंत्र पर सकारात्मक असर छोड़ता है. 

आपने अभिमन्यु के चक्रव्यूह भेदने के बारे में अवश्य सुना होगा और यह भी जानते ही होंगे कि गर्भ में उसने यह विद्या तभी सीख ली थी, जब उसके पिता सव्यसाची अर्जुन, उसकी माता सुभद्रा को यह चक्रव्यूह भेदने की विधि समझा रहे थे.

महाभारत काल की यह कथा पढ़ें: एकलव्य चरितं

3. सीमन्तोन्नयन

सीमन्तोन्नयन भी एक तरह से पुंसवन का ही एक्सटेंशन है. 

संधि विच्छेद करें तो- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना'. 

यानी इस संस्कार में पति अपनी धर्म पत्नी के केशों (बाल) को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इस हेतु इसका नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया.

गर्भ के छठे अथवा आठवें महीने में इसे करते हैं. 

मेडिकल टर्म में इसी दौरान बच्चे का दिमाग व दिल विकसित होता है और ऐसे में माता को ऐसे वातावरण में रहना चाहिए, जहां अच्छे गुण, स्वभाव व कर्म किए जाते हैं. 

इस संस्कार के बारे में भक्त प्रहलाद का उदाहरण मिलता है, जिसके अनुसार भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद ने इसी समय भगवदभक्ति का उपदेश दिया था और प्रह्लाद ने गर्भ में ही इसे सुनकर आत्मसात कर लिया था. 

4. जातकर्म

जन्म के ठीक बाद नवजात शिशु की नाल काटने से तुरंत पहले इस संस्कार को करते हैं. 

इस हेतु दो बूंद घी व छह बूंद शहद का सम्मिश्रण तैयार करके, घृत गुरु मंत्र के साथ शिशु को चटाते हैं. 

फिर माता बालक को स्तनपान कराती है.

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वैज्ञानिकों के अनुसार भी बच्चे के जन्म के 30 ​मिनट के दौरान ही उसे उसकी मां का दूध पिलाना चाहिए और इस प्रक्रिया में भी लगभग इतना ही समय लगता है. 

5. नामकरण

जैसा नाम, वैसा काम!

ज़ाहिर तौर पर यह मनोविज्ञान है. 

लोग अपना नाम भी बदलते हैं, ताकि उनका जीवन सही दिशा पकड़े व नकारात्मकता से दूर रहे. मनीषियों ने इसी हेतु नामकरण संस्कार करने का आदेश दिया है. 

बता दें कि शिशु का नाम अनाप-शनाप रखने की बजाय गुणवाचक रखने को प्रधानता मिलनी चाहिए. इसमें नक्षत्र अथवा राशियों के अनुसार भी नाम रखते हैं, जिससे जन्मकुंडली बनती है. 

किसी शिशु के जन्म के दसवें दिन नामकरण संस्कार करने का रिवाज है. ठीक इसी दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी करते हैं.

6. निष्क्रमण

निष्क्रमण मतलब बाहर निकालना. 

निष्क्रमण् संस्कार में पहली बार, नवजात शिशु सूर्य व चन्द्रमा की ज्योति देखता है.

सुबह की हल्की धूप एवं सायं काल में चंद्रमा की शीतलता नवजात बच्चे को रोगों से सुरक्षित रखता है.

शास्त्रों के अनुसार इस संस्कार से शिशु तेजस्वी एवं विनम्र बनने की ओर अग्रसर होता है. इसे जन्म के चौथे महीने में करने का रिवाज है. 

7. अन्नप्राशन

उपरोक्त वर्णित संस्कार कोई करे न करे, किन्तु अन्नप्राशन संस्कार तो अवश्य ही करता है.

पहले शिशु माता का दूध ही पिता रहता है, किन्तु उसकी बृद्धि ज्यों ज्यों होती है, उसे अतिरिक्त खुराक की आवश्यकता पड़ती जाती है. ऐसे में जन्म के छठे महीने में उसका अन्नप्राशन संस्कार करते हैं. 

इसमें शिशु, चांदी की कटोरी अथवा थाली में खीर या दूसरा ऐसा ही कोई शिशु योग्य खाद्य पदार्थ खाता है.

खीर इसलिए क्योंकि जब चांदी की कटोरी में, गर्म दूध की खीर पड़ती है, तो उसमें चांदी के तत्व शरीर को मजबूत बनाते हैं.

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8. मुंडन/ चूड़ाकर्म

Mundan / Choodakarma Sanskar (Pic: indastro.com)

जन्म के बाद प्रथम अथवा तीसरे अथवा पांचवें साला में इस संस्कार को करते हैं.

मुंडन में जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को साफ करने से बालक तेजस्वी बनता है. चूंकि जन्म के समय बालक के सिर की त्वचा बेहद नर्म होती है, इसलिए एक या उससे अधिक की आयु में मुंडन संस्कार करते हैं. 

यह संस्कार भी प्रत्येक सनातनधर्मी के यहाँ सम्पूर्ण मंत्रोच्चार के साथ किया जाता है. 

9. कर्ण-छेदन

आज कल या परंपरा पुनः शुरू हो गयी प्रतीत होती है, बेशक शौकिया ही सही!

वैसे कान छेदना बेटियों के लिए परंपरा मानी जाती है, पर बेटों के लिए भी कर्ण छेदन ​अनिवार्य माना गया है.

इसे आप एक तरह से एक्यूपंक्चर कह सकते हैं. कहते हैं कि कर्णछेदन से तमाम बीमारियाँ दूर हो जाती हैं एवं श्रवण शक्ति में भी बृद्धि होती है.

 ज्योतिष के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इसे करना श्रेयस्कर होता है.

10. विद्यारंभ

अक्षर बोध की शुरुआत बसंत पंचमी के दिन उत्तम मानी जाती है.

इस शुभ मुहूर्त में विद्यारम्भ कर बच्चा आगे की पढाई शुरू करता है. माना जाता है कि इससे माँ सरस्वती की कृपा बच्चे पर बनी रहती है.

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11. यज्ञोपवीत/ उपनयन

यज्ञ + उपवीत, अर्थात गुरू के पास ले जाने का नाम है- उपनयन संस्कार.

सामान्य रूप में देखें तो इसमें बालक जनेऊ पहनता है.

इस संस्कार के समय वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है व बच्चा तेजस्वी होता है.

12. वेदारम्भ

वेदों का ज्ञान!

कौन प्राप्त नहीं करना चाहता, पर हमारे शास्त्र इसको पाने का उचित समय हमें बताते हैं. 

वेदारम्भ से पहले, शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके, एक संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा करना उचित माना जाता है. 

13. केशान्त

गुरुकुल से विदाई लेने एवं गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का नाम है केशांत.

इसमें पहली बार बालक अपनी दाढी बनाता है एवं स्नान करके पवित्र होता है और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है.

14. समावर्तन

जीवन के संघर्षों के लिए क्या आप पूर्ण रूप से तैयार हैं?

यही इस संस्कार का अर्थ है. 

केशान्त संस्कार के उपरान्त, स्नान करना समावर्तन संस्कार माना जाता है. विशेष मन्त्रोच्चार करके विवाह संस्कार की योग्यता इस संस्कार में प्राप्त होती है.

15. विवाह

अब तक बालक युवक में परिवर्तित हो चुका होता है व  दायित्व निर्वाह करने की परिपक्वता को धारण कर चुका होता है.

फिर क्या?

आइये जीवन के मैदान में और गृहस्थ बनकर अपने ज्ञान और अपनी क्षमता से परिवार को समाज को लाभ दीजिये.

16. दाह संस्कार / अंतिम संस्कार

हम सभी इसे बखूबी जानते हैं.

किसी व्यक्ति के मृत शरीर को धार्मिक रीति से चिता में जलाने की प्रथा ही अन्त्येष्टि क्रिया या अन्त्येष्टि संस्कार कहा है. 

अंतिम संस्कार में 13 दिनों तक अलग-अलग कर्म करना बतलाया गया है.

जीवन तो सभी जीते हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास के बताये इन संस्कारों के बिना 'योग्य जीवन' संभव नहीं!

Sixteen Rituals of Sanatan Dharma, Solah Sanskar in Hindi (Pic: Webduniya)

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